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Sunday, September 11, 2011

तुम्हारी अंजुमन से उठ के दीवाने कहाँ जाते -- कतील शिफाई

तुम्हारी  अंजुमन  से  उठ  के  दीवाने  कहाँ  जाते
जो वाबस्ता हुए तुम से वो अफसाने कहाँ जाते

निकल  कर  दैर-ओ-काबा  से  अगर  मिलता  न  मैखाना
तो  ठुकराए  हुए  इन्सान  खुदा  जाने  कहाँ  जाते

तुम्हारी  बेरुखी  ने  लाज  रख  ली  बादाखाने  की
तुम  आँखों  से  पिला  देते  तो  पैमाने  कहाँ  जाते

चलो  अछा  हुआ  काम  आ  गई  दीवानगी  अपनी
वरना हम  ज़माने  भर  को  समझाने  कहाँ  जाते

'क़तील' अपना  मुक़द्दर  गम  से  बेगाना  अगर  होता
फिर  तो  अपने-पराये  हमसे  पहचाने  कहाँ  जाते.

-----: कतील शिफाई 

खातिर से या लिहाज़ से मैं मान तो गया -- दाग देहलवी

खातिर  से  या  लिहाज़  से  मैं  मान  तो  गया
झूठी  क़सम  से  आप  का  इमान  तो  गया

दिल  ले  के  मुफ्त  कहते  हैं  कुछ  काम  का  नहीं
उल्टी  शिकायतें  रहीं   एहसान  तो  गया

अब  शय-ए-राज़-ए-इश्क  गो  ज़िल्लतें  हुई
लेकिन  उसे  जाता  तो  दिया, जान  तो  गया

देखा  है  बुतकदे  में   जो  ऐ  शेख  कुछ  ना  कुछ
ईमान  की  तो  ये  है  कि  ईमान  तो  गया

डरता  हूँ  देख  कर  दिल-ए-बे-आरजू  को  मैं
सुन-सान  घर  ये  क्यूँ  ना  हो  मेहमान  तो  गया

गो  नामाबर  से  खुश  ना  हुआ  पर  हज़ार  शुक्र
मुझको  वो  मेरे  नाम  से  पहचान  तो  गया

होश-ओ-हवास-ओ-तब-ओ-तवां  "दाग" जा  चुक
अब  हम  भी  जाने  वाले  हैं  सामान  तो  गया

-----: दाग देहलवी

बहुत दिन हो गए शायद सहारा कर लिया उसने -- वासी शाह

बहुत दिन हो गए शायद सहारा कर लिया उसने,
हमारे बाद भी आखिर गुजरा कर लिया उसने.
हमारा जिक्र तो उसके लबों पर आ नहीं सकता,
हमें एहसास है हमसे किनारा कर लिया उसने.
वो बस्ती गैर की बस्ती वो कूचा गैर का कूचा,
सुना है इश्क भी अब तो दोबारा कर लिया उसने.
सुना है गैर की बाँहों को वो अपना घर समझता है,
लगता है मेरा ये दुःख गवांरा कर लिया उसने.
भुला कर प्यार की कसमें वो वादे तोड़ कर "वासी"
किसी को जिंदगी से भी प्यारा कर लिया उसने.
-----: वासी शाह 

धूप के साथ गया साथ निभाने वाला -- वजीर आघा

धूप के साथ गया साथ निभाने वाला,
अब कहाँ आएगा वो लौट के आने वाला.
रेत पर छोड़ गया नक्श हजारों में अपने,
किसी पागल की तरह नक्श मिटने वाला.
सब्ज़ शाखें कभी ऐसे तो नहीं चिटखती हैं,
कौन आया है परिंदों को डराने वाला.
आरिज़-ए-शाम की सुर्खी ने किया फाश उसे,
पर्दा-ए-अब्र में था आग लगाने वाला.
सफ़र-ए-शब् का तकाज़ा है मेरे साथ रहो,
दश्त पुर_हौल है तूफ़ान है आने वाला.
मुझ को दर_पर्दा सुनाता रहा किस्सा अपना,
अगले वक्तों की हिकायात सुनाने वाला.
शबनमी घास घने फूल लरज़ती किरणे,
कौन आया है खजानों को लुटाने वाला.
अब तो आराम करें सोचती आँखें मेरी,
रात का आखिरी तारा भी है जाने वाला.
-----: वजीर आघा

जब मेरी याद सताए तो मुझे ख़त लिखना - ज़फर गोरखपुरी

जब मेरी याद सताए तो मुझे ख़त लिखना,
तुम को जब नींद ना आये तो मुझे ख़त लिखना.
 
नीले पेड़ों की घनी छावों में हंसता सावन,
प्यासी धरती में समाने को तरसता सावन,
रात भर छत पे लगातार बरसता सावन,
दिल में जब आग लगाये तो मुझे ख़त लिखना.
 
जब फड़क उठे किसी शाख पे पत्ता कोई,
गुदगुदाए तुम्हे बिता हुआ लम्हा कोई,
जब मेरी याद का बेचैन सफीना कोई,
जी को रह रह के जलाए तो मुझे ख़त लिखना.
 
जब निगाहों के लिए कोई नज़ारा न रहे,
चाँद छिप जाये गगन पर कोई सहारा ना रहे,
लोग हों जाएँ पराये तो मुझे ख़त लिखना.
 
-----: ज़फर गोरखपुरी 

क्या उम्मीद करें हम उनसे जिनको वफ़ा मालूम नहीं -- ज़फर गोरखपुरी

क्या उम्मीद करें हम उनसे जिनको वफ़ा मालूम नहीं,
गम देंना मालुम है लेकिन गम की दवा मालूम नहीं.
 
जिन की गली में उम्र गवां दी जीवन भर हैरान रहे,
पास भी आके पास ना आये जान के भी अनजान रहे,
कौन सी आखिर की थी हमने ऐसी खता मालूम नहीं.
 
ए मेरे पागल अरमानों झूठे बंधन तोड़ भी दो,
ए मेरी ज़ख़्मी उम्मीदों दिल का दामन छोड़ भी दो,
तुमको अभी इस नगरी  में जीने की सजा मालूम नहीं.
 
-----: ज़फर गोरखपुरी 

Saturday, September 10, 2011

कभी नजरें मिलाने में ज़माने बीत जाते हैं -- शशांक शेखर

कभी  नजरें  मिलाने में ज़माने  बीत  जाते  हैं
कभी  नजरें  चुराने में ज़माने  बीत  जाते  हैं

किसी   ने  आंख  भी  खोली  तो  सोने  की  नगरी  में
किसी   को  घर  बनाने  में  ज़माने  बीत  जाते  हैं.

कई  काली  स्याह  रातें  हमें  इक  पल  की  लगती  हैं
कभी  इक  पल  बिताने  में  ज़माने  बीत  जाते  हैं

कभी  खुला  दरवाज़ा  खड़ी  थी सामने  मंजिल
कभी  मंजिल  को  पाने   में  ज़माने  बीत  जाते  हैं

इक  पल  में  टूट  जाते  हैं  उम्र भर  के  रिश्ते
वो  रिश्ते  जो  बनाने  में  ज़माने  बीत  जाते  हैं.

-----: शशांक शेखर 

शबनम के आंसू फूल पर ये तो वही किस्सा हुआ -- डॉ. बशीर बद्र

शबनम  के  आंसू  फूल  पर  ये  तो  वही  किस्सा  हुआ 
आँखें  मेरी  भीगी  हुईं   चेहरा  तेरा  उतारा  हुआ 

अब  इन  दिनों  मेरी  ग़ज़ल  खुश्बू  की  इक  तस्वीर  है 
हर  लफ्ज़  गुंचे  की  तरह  खिल  कर  तेरा  चेहरा  हुआ 

मंदिर  गए  मस्जिद  गए  पीरों  फकीरों  से  मिले 
इक  उस  को  पाने  के  लिए  क्या  क्या  किया  क्या  क्या  हुआ


शायद  इसे  भी  ले  गए  अच्छे  दिनों  के  काफिले 
इस  बाग़  में  इक  फूल  था  तेरी  तरह  हंसता  हुआ 

अनमोल  मोती  प्यार  के, दुनिया  चुरा  के  ले  गई 
दिल  की  हवेली  का  कोई  दरवाज़ा  था  टूटा  हुआ

-----: डॉ. बशीर बद्र

किसी की शाह में दहलीज़ पर दीया ना रखो - डॉ. बशीर बद्र

सियाहियों के बने हर्फ़ हर्फ़ धोते हैं,
ये लोग रात में कागज़ कहाँ भिगोतें हैं.
 
किसी की शाह में दहलीज़ पर दीया ना रखो,
किवाड़ सुखी हुई लकड़ियों के बने होतें हैं.
 
चिराग पानी में मौजों से पूछते होंगे,
वो कौन है जो कश्तियाँ डुबोते हैं.
 
कदीम कस्बों में क्या सुकून होता है,
थके थके हमारे बुज़ुर्ग सोते हैं.
 
चमकती है कहीं सदियों में आंसुओं की ज़मीं,
ग़ज़ल के शेर कहाँ रोज़ रोज़ होते हैं.
 
-----: डॉ. बशीर बद्र 

वही ताज है वही तख़्त है -- डॉ. बशीर बद्र

वही  ताज  है  वही  तख़्त  है  वही  ज़हर  है  वही  जाम  है 
ये  वही  खुदा  की  ज़मीन  है  ये  वही  बुतों  का  निजाम  है.
 
बड़े  शौक़  से  मेरा  घर  जला  कोई  आंच  ना  तुझपे  आयेगी 
ये  जुबां  किसी  ने  खरीद  ली  ये  कलम  किसी  का  गुलाम  है. 

मैं ये मानता हूँ मेरे दीये तेरी आँधियों ने बुझा दिए
मगर  इक  जुगनू  हवाओं  में  अभी  रौशनी  का  इमाम  है. 

-----: डॉ. बशीर बद्र

ये नए मिज़ाज का शहर है, ज़रा फासले से मिला करो -- डॉ. बशीर बद्र

यूं  ही  बेसबब  न  फिरा  करो, कोई  शाम  घर  भी  रहा  करो 
वो ग़ज़ल  की  सच्ची  किताब  है, उसे चुपके  चुपके  पढ़ा  करो


कोई  हाथ  भी  ना  मिलाएगा, जो  गले  मिलोगे  तपाक  से 
ये  नए  मिज़ाज  का  शहर  है, ज़रा  फासले  से  मिला  करो 

अभी  राह  में  कई  मोड़  हैं, कोई  आयेगा  कोई  जाएगा 
तुम्हें  जिसने  दिल  से  भुला  दिया  उसे  भूलने  की  दुआ  करो 

मुझे  इश्तहार  सी  लगती  हैं, ये  मोहब्बतों  की  कहानियां 
जो  कहा  नहीं  वो  सूना  करो, जो  सूना  नहीं  वो  कहा  करो 

कभी  हुस्न-ए-पर्दानशीं  भी  हो  ज़रा  आशिकाना  लिबास  में 
जो मैं बन-संवर के कहीं चलूं, मेरे साथ तुम भी चला करो

ये  खिजा  की  ज़र्द-सी  शाम  में, जो  उदास  पेड़  के  पास  है 
ये  तुम्हारे  घर  की  बहार  है, इसे  आंसुओं  से  हरा  करो 

नहीं  बेहिजाब  वो  चाँद  सा  की  नज़र  का  कोई  असर  नहीं 
उसे  तनी  गर्मी-ए-शौक़  से  बड़ी  देर  तक  ना  ताका  करो

-----: डॉ. बशीर बद्र 

यों लगे दोस्त तेरा मुझसे खफा हो जाना -- कतील शिफाई

यों  लगे  दोस्त  तेरा  मुझसे  खफा  हो  जाना 
जिस  तरह  फूल  से  खुश्बू  का  जुदा  हो  जाना 

अहल-ए-दिल  से  ये  तेरा  तर्क-ए-ताल्लुक 
वक़्त  से  पहले  असीरों  का  रिहा  हो  जाना 

यों  अगर  हो  तो  जहां  में  कोई  काफिर  न  रहे 
मोअजुज़ा  तेरे  वादे  का  वफ़ा  हो  जाना 

ज़िंदगी  मैं  भी  चलूँगा  तेरे  पीछे-पीछे 
तू  मेरे  दोस्त  का  नक्श-ए-काफ-ए-पा हो  जाना
 
जाने  वो  कौन  सी  कैफियत-ए-गम ख्वारी है 
मेरे  पीते  ही  "क़तील" उस  को  नशा  हो  जाना 

-----: कतील शिफाई

ज़िंदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं -- कतील शिफाई

कतील साहब के इस ग़ज़ल को मेंहदी हसन साहब ने अपने आवाज़ की जिस खूबसूरती से नवाजा है, वो काबिले तारीफ़ है.


ज़िंदगी  में  तो  सभी प्यार  किया  करते  हैं 
मैं  तो  मर  कर  भी  मेरी  जान  तुझे  चाहूँगा 

तू  मिला  है  तो  ये  एहसास  हुआ  है  मुझको 
ये  मेरी  उम्र  मोहब्बत  के  लिए  थोड़ी  है 
इक  ज़रा  सा  गम-ए-दौरां  का  भी  हक  है  जिस  पर 
मैं  ने  वो  सांस  भी  तेरे  लिए  रख  छोडी  है 
तुझ  पे  हो  जाऊँगा  कुरबान  तुझे  चाहूँगा 

अपने  जज़्बात  में  नग्मात  रचाने  के  लिए 
मैं  ने  धड़कन  की  तरह  दिल  में  बसाया  है  तुझे 
मैं  तसव्वुर  भी  जुदाई  का  भला  कैसे  करूं 
मैं  ने  किस्मत  की  लकीरों  से  चुराया  है  तुझे 
प्यार  का  बन  के  निगेहबान  तुझे  चाहूँगा

तेरी  हर  चाप  से  जलाते  हैं  ख्यालों  में  चिराग 
जब  भी  तू  आये  जगाता  हुआ  जादू  आये 
तुझको  छू  लूँ  तो  फिर  ऐ  जान-ए-तमन्ना  मुझको 
देर  तक  अपने  बदन  से  तेरी  खुश्बू  आये 
तू  बहारों  का  है  उनवान  तुझे  चाहूँगा

-----: कतील शिफाई

तोड़ कर अहद-ए-करम ना-आशंना हो जाईये - हशरत मोहानी

तोड़ कर अहद-ए-करम ना-आशंना हो जाईये,
बन्दा परवार जाईये, अच्छा खफा हो जाइये.
 
राह में मिलिए कभी मुझसे तो अज़राह-ए-सितम,
होंठ अपने काट कर फ़ौरन जुदा हो जाइये.
 
जी में आता है की उस शोख-ए-तगाफुल केश से ,
अब न मिलिए फिर कभी और बेवफा हो जाइये.
 
हाय रे बे-इख्तियारी ये तो सब कुछ हो मगर,
उस सरापा नाज़ से क्यूँ कर खफा हो जाइये. 
 
------: हशरत मोहानी